मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान क्यों इतना जरूरी? जानें तिल और गुड़ बांटने का भी सीक्रेट

माघ का महीना वैसे भी अपने आप में खास है. चाहे बात मौसम की हो या धर्म की. इसी महीने मकर संक्रांति आती है और हर जगह लोग इसे अपने-अपने तरीके से मनाते हैं. हिंदू परंपरा में इस दिन खिचड़ी दान करने का बड़ा महत्त्व है. लोग मानते हैं कि इस दिन दान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और पुण्य भी मिलता है. ग्रंथों में लिखा है कि अगर आप अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा से खिचड़ी दान करते हैं तो उसका फल कई गुना बढ़ जाता है. सवाल है कि कि क्या सिर्फ संक्रांति के दिन ही दान करना जरूरी है. पंडितों की मानें तो माघ के महीने में कभी भी खिचड़ी दान करो, उसका अच्छा फल जरूर मिलेगा.

पिता बेटे के घर
कि मकर संक्रांति वो समय है जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं. शास्त्रों के हिसाब से सूर्य शनि के पिता माने जाते हैं. पिता का बेटे के घर जाना शुभ संकेत है और इसी वजह से इस दिन को मकर संक्रांति कहा जाता है. इस दिन तिल, गुड़, अनाज और खास तौर पर खिचड़ी का दान करने की परंपरा है. पंडित मिश्रा कहते हैं कि इस दिन दान का फल कई गुना बढ़कर मिलता है और यह परंपरा बहुत पुरानी है.

असली दान क्या
पंडित उमा चंद्र मिश्रा बताते हैं कि इसी दिन गंगा जी पृथ्वी पर आई थीं और कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में मिली थीं. इसलिए मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान का बड़ा महत्त्व है. लोग सुबह-सुबह नदी में स्नान करते हैं और फिर दान-पुण्य करते हैं. अगर किसी के आसपास नदी नहीं है तो घर पर ही तिल मिलाकर नहाना चाहिए. ऐसा करने से भी उतना ही पुण्य मिलता है. मूंग दाल और चावल से बनी खिचड़ी सात्त्विक मानी जाती है और ये शरीर को ताकत और गर्मी दोनों देती है. पंडित मिश्रा के मुताबिक, मूंग दाल की खिचड़ी का दान खास पुण्य देता है. कपड़े और पैसे का दान भी अच्छा माना गया है. ये दान ब्राह्मण या जरूरतमंद लोगों को देना चाहिए. असली दान वही है जिसमें मन से श्रद्धा और सहजता हो बस किसी को कुछ पकड़ा देने से काम नहीं चलता.
नाम अलग-अलग
भारत के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति के कई नाम हैं. कहीं पोंगल, कहीं लोहड़ी, तो कहीं पाटी या संक्रांत. तिल और गुड़ खाने और बांटने की भी परंपरा है. माना जाता है कि इससे शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं और रिश्तों में मिठास भी बढ़ती है. मकर संक्रांति सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि आस्था, मौसम और परंपरा का संगम है. ये दिन हमें दान का असली अर्थ समझाता है और यही वजह है कि हमारे बुजुर्ग हमेशा दान और मदद करने की सीख देते रहे हैं.