छिंदवाड़ा/मुरैना: मध्य प्रदेश में इन दिनों कड़ाके की ठंड के साथ घना कोहरे देखने को मिल रहा है. गुरुवार को प्रदेश के अधिकांश शहरों में न्यूनतम तापमान में गिरावट दर्ज की गई. छतरपुर का खजुराहो सबसे ठंडा रहा. वहीं छिंदवाड़ा, मुरैना और श्योपुर सहित कई शहरों में शीतलहर और ओस की बूंदें पौधों पर बर्फ की तरह जमी दिखाई दीं. मौसम विभाग के अनुसार, जनवरी में ठंड का असर और बढ़ेगा, क्योंकि हिमालय के ऊपर पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय है. आने वाले दिनों में तापमान में और गिरावट होने की संभावना है.
छिंदवाड़ा में पेड़ों पर जमी बर्फ
छिंदवाड़ा में इस बार ठंड ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. साल का सबसे ठंडा दिन मंगलवार 6 जनवरी को दर्ज किया है. सोमवार-मंगलवार की दरमियानी रात को 2.2 डिग्री तापमान दर्ज किया गया है. शहर में जगह-जगह लोग अलाव जलाकर ठंड से बच रहे हैं लोग, तो वहीं नगर निगम ने भी सार्वजनिक जगहों पर अलाव जलाने की व्यवस्था की है. सड़कों पर विजिबिलिटी बहुत कम होने से वाहन चालकों की मुसीबत बढ़ गई है. पेड़-पौधों के पत्तों पर ओस की परत बर्फ की तरह जमी है.
1957 में की थी भीमबेटका की गुफाओं की खोज
वाकणकर के काम को पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने आगे बढ़ाने का काम किया है. उन्होंने वाकणकर के साथ लंबे समय तक काम किया. इसलिए मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें आज पुरस्कृत किया है. भीमबेटका राजधानी भोपाल से सटे रायसेन जिले में मौजूद है. डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने वर्ष 1957 में भीमबेटका की गुफाओं की खोज की थी। इन शैलाश्रयों में प्रागैतिहासिक काल के करीबन 400 शैल चित्र पाए गए. इनकी कार्बन डेटिंग कराई गई, जो लाखों साल पुराने पाए गए.
'वाकणकर की वजह से मुश्किल में पड़ गए थे सीएम'
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि "वाकणकर ने अपना पूरा जीवन भारत की सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में बिता दिया. उन्होंने अपने शोध से देश की समृद्ध प्राचीन संस्कृति और सभ्यता से पूरे विश्व को परिचित कराया. उन्होंने अपने शोध से बताया कि सरस्वती नदी भारत में बहती थी, उन्होंने इस नदी का मार्ग भी बताया."
डॉ मोहन यादव ने बताया कि "वे संघ से जुड़े हुए थे, इसलिए जब वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें पद्म श्री दिए जाने का ऐलान किया, तो तत्कालीन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी के सामने संकट खड़ा हो गया. वाकणकर ने कह दिया कि वे संघ की गणवेश में ही जाएंगे, बाद में सेठी जी ने उन्हें जैसे-तैसे मनाया और सिर्फ संघ की टोपी पहनने के लिए तैयार किया."
